तन के चलता,
सीना चौड़ा किए
हाथ में लिए हुए बन्दूक !
निडर, बेखऔफ़, बेझिझक
अपनी जान हथेली पे लिए हुए !
यह तस्वीर मेरे देश के किसी जांबाज़ सिपाही की नहीं
उस आतंकवादी की है -
जिसने लहूलुहान कर दिया है हम सबको !!!!
कदम्ब तले खड़े
याद कर रही हूँ कृष्ण को
उस मुरली की तान को
जिससे में भी खिंची चली आयी हूँ
बेहद रोमांचित हूँ ,
और सम्मोहित भी
महसूस कर रही हूँ नजदीकी -
उस माधव की !
दिन में लिखती हूँ चाँद के बारे में,
रात में सोचूँ सूरज !!
जो मिला उसे अल्टा-पल्टा के देखना है
खासतौर से ज़िन्दगी !!!
परतें खुलती जा रहीं हैं
और मैं रुकना चाह नहीं रही हूँ !
लो ,
फिर निकल आया चाँद अपने ठिकाने से !
और चल पड़ा है अलमस्त
अपने साथी सितारों की टोली के साथ
अब कौन समझाए इसे
इतनी रात गए घूमना अच्छी बात नहीं
और बेशर्मों की तरह
किसी की भी खिड़की से तांक-झाँक करना -
अरे, कुछ समझो भी !!
वो सितारा
सामने टंगा
अंधेरे में कुछ ज़्यादा ही टिमटिमाता हुआ,
सिखाता है ज़िन्दगी में
अपना दम पकड़े रहना !