मन है हल्का
और है ठिठका
एक बादल मेरी खिड़की के बाहर,
ज़रा घूम के आती हूँ कुछ दूर .........
इस नर्म मुलायम गद्दे पर
शायद उस सतरंगी दुनिया का कोई कोना मिल जाए !!
गिरते हुए पत्ते -
जैसे बैले - नर्तक का लहराना !
अनदेखे और अनसुने
वाद्यों की लय - ताल पर
जीवन गतिमान है - निशब्द
समझ जाना !
मैंने माँगा
वक्त से आँचल
दे दो मुझको छाँव थोड़ी !!
धूप बहुत है
जलता मन है
ठंडे-ठंडे हर्फ़ मैं मांगू
दे दो कुछ बरसात थोड़ी !!
कैसा मौसम, कैसा मौसम
देखा न कभी ऐसा मौसम !
जो पात हरे, ताज डार झरे
ज्यों स्वप्न जीवन की शाखों से !
कैसा मौसम.............
धानी चूनर भई पीत वरण
ज्यों म्लान दुखों की पांतों से !
कैसा मौसम..............
वीरान ठूंठ, सुख गए रूठ
ज्यों पिया मिलन की रातों से !
देश के नेताओं को समर्पित -
मेरे आसपास सिर्फ़ ठूंठ हैं !
इस जानलेवा मौसम में ,
जो जीवन निचोड़ ले रहा है,
चाहत है हरे-भरे वृक्ष की छाँव की,
बह के आती ठंडी बयार की ,
कुछ जीवन-दायिनी फलों की,
कुछ ताजगी देने वाले फूलों की,
पर मेरे आसपास सिर्फ़ ठूंठ हैं !!
तन के चलता,
सीना चौड़ा किए
हाथ में लिए हुए बन्दूक !
निडर, बेखऔफ़, बेझिझक
अपनी जान हथेली पे लिए हुए !
यह तस्वीर मेरे देश के किसी जांबाज़ सिपाही की नहीं
उस आतंकवादी की है -
जिसने लहूलुहान कर दिया है हम सबको !!!!
कदम्ब तले खड़े
याद कर रही हूँ कृष्ण को
उस मुरली की तान को
जिससे में भी खिंची चली आयी हूँ
बेहद रोमांचित हूँ ,
और सम्मोहित भी
महसूस कर रही हूँ नजदीकी -
उस माधव की !