Thursday, June 18, 2009

सुबह-सुबह दरवाजा खोलते ही

उड़ेल दी सूरज ने मुझ पे रौशनी !!

प्यार से ठोकी धूप ने मेरी पीठ और कहा

चल पड़ - दिन निकल आया है !!

साथी की तरह हौले-हौले

मेरे कानों में स्वर लहरी घोलती

साथ में बह चली मंद हवा !!

लौटते में रात बहुत हो चली थी

तभी तो चाँद घर तक छोड़ने चला आया !!

सच्चे साथी ही ज़िन्दगी की वजह हैं !!

Thursday, May 14, 2009

उस प्यारे शरारती बचपन की यादें -

तैरते हुए बुलबुलों को पकड़ना ,

उँगली लगते ही फूट जाते थे जो !

फूँक से उड़ाना,

वो बुढ़िया के बाल !

बहुत सारे दोस्तों के साथ ,

बहुत सारा खेलना !

फ़िर रात क्यों हो गई ?

बहुत गुस्सा आना !!

कितना आसान था

कट्टी और मिट्ठी कर लेना

नाराज़गी अरसे तक बोझ बनकर नहीं रहती थी ,

भूल जाने में न कोई तकलीफ

ना ही सच बोलने में कोई प्रयास !

Sunday, May 10, 2009

कल रात आंखें मूंदते ही

चल पड़ी मैं अनजान रास्तों पर -

बहते-उड़ते ,

कभी घुप्प अंधेरों में ;

तो कभी चमकदार रौशनी में !

मिलते-मिलाते ,

साथ छोड़ चुके लोगों से

और पूरा करते वो सब काम ,

जो दिन में छूट गए !!

कब भोर ने मुझे थपथपाया

पता ही नहीं चला !!!!

Thursday, May 7, 2009

तुम्हारे चंद शब्द -

अचानक बरसीं ये नन्ही-नन्ही बूँदें !

ठंडक भर गई अंतर में !!

कोयल की कूक सी भली लगती,

दूरी को पाटती,

तुम्हारी आवाज़ की मुस्कान!

मेरे दोस्त,

ज्यों सामने खड़े हो तुम-

गले लगाने को जी चाहा !!!

Thursday, April 23, 2009

दिन उठा और निकल पड़ा अपने रास्ते

हमराही कोई हो या नहीं !

कलियाँ खिल गयीं और झूम गई डाली

जलतरंग बजी हो या नहीं !

सांझ उतरती आ गई आँगन में

दीये जलाये हों या नहीं !

रात ने फैलाई अपनी तारों भरी लोई

सुकून भरी नींद हम ओढ़ पाए हों या नहीं !

हर पल है आस और हर साँस है सुकून

हम महसूस कर पाए हों या नहीं !

Wednesday, April 15, 2009

कल रात ,

चाँद अकेला टहल रहा था आसमान में

कुछ धूमिल और अनमना सा

छितरे-बिखरे कुछ बादलों के पीछे

बार-बार झाँक कर देखता

पूछा तो बोला -

ढूंढते-ढूंढते थक गया हूँ

अपने दोस्तों-यारों ,

साथी सितारों को

बहुत चिढ़ाते हैं मुझे कभी-कभी ये सब मिलके !!

Saturday, April 4, 2009

दुधवा के जंगलों में

पेड़ों में से छन के आती सुबह की धूप

और वहीं खड़ा एक चित्तीदार हिरण

सुनहरी आभा हिरण से धूप को जाती

या धूप से हिरण में समाती ???

निश्चल खड़ी -

आंखों से दिमाग की कटोरी में उड़ेल रही हूँ

अपने प्राणों की तरावट का यह अमृत -पान !

कौंध जाता है बस एक ख़्याल

सीता ने क्या यही हिरण देखा था ?