देखा जो झांकती हुई किरणों को
कालिमा लदे बादलों के पीछे से ,
भेदती हुई निकलती आती रौशनी
तरलता भरती जा रही थी मुझमें ,
अँधेरा तो तभी तक है
जब तक रौशनी नहीं -
कोई पुरानी-सी , सीखी हुई बात तैर गई ज़हन में
और दिन हो गया उस पल !!!
बचपन का भोलापन भी बेहद प्यारा है -
लगा था चलना सीख लिया ,
पर वो तो गिर कर खड़े होने का अभ्यास भर था !!!
तो लो,
फिर से उठी और चल पड़ी मैं :)
थपेड़े तो लगेंगे ही और गिरना भी तय है -
रास्ते हैं ही इतने उबड़ - खाबड़ और घुमावदार !!
पर उस मालिक की महर से
हरे - भरे पेड़ फैला देते मुझ पर ठंडी छाँव ,
अपनी आवाज़ से ज़िन्दगी में मिठास घोलते पंछी
और रंग बिखेरते फूल !!
रोज़ सुबह एक नए दिन की शुरुआत
और सामने वो अभी ख़त्म न हुआ रास्ता ,
फिर से उठ कर चलने की हिम्मत देता है !!!