Tuesday, January 12, 2010

मन है ज्यों

लबालब नदी ,

जीवन की ऊष्मा से तरल ,

झिलमिल करती आशा से !!

मन है ज्यों

मेघ आच्छादित आकाश,

उमड़- घुमड़ कर बरसाने को आतुर ,

नेह भरी बूँदें !!

मन है ज्यों

रंग-बिरंगी तितलियाँ ,

सुन्दर हैं क्षणिक ,

पर शाश्वत हैं उल्लासित !!

मन है ज्यों

अनछुए श्वेत बादल ,

अंतहीन व्योम में तैरते,

सब बेड़ियों से पार !!

मन है ज्यों

तारों भरी रात में ,

लुका-छिपी खेलते सपने,

लम्बी छलांगें लगाते ,

एक से दूसरे सितारे पर !!

Wednesday, November 4, 2009

देखा जो झांकती हुई किरणों को

कालिमा लदे बादलों के पीछे से ,

भेदती हुई निकलती आती रौशनी

तरलता भरती जा रही थी मुझमें ,

अँधेरा तो तभी तक है

जब तक रौशनी नहीं -

कोई पुरानी-सी , सीखी हुई बात तैर गई ज़हन में

और दिन हो गया उस पल !!!

Thursday, September 17, 2009

धागा है यह प्रेम का ,

नाज़ुक पर कमज़ोर नहीं !!

ऊंची-ऊंची हैं चट्टानें ,

पर झरना है - रुकता तो नहीं !!

उम्मीदों का दामन पकड़ा ,

हँसना है रोना तो नहीं !!

रोना ,गिरना ,थमना, रुकना ,

पड़ाव हैं ये ठहराव नहीं !!

जीवन हमको रोज़ सिखाता ,

परखता तो है पर दोस्त यही !!

Saturday, September 5, 2009

दिन ने खोली,

अपनी झोली -

लगा बाँटने बेरोकटोक !!

भर-भर बांटे

रौशन कोने ,

चमचमाते छत- गलियारे

और दमकते घर-चौबारे !!!

दिए चिड़ियों को ,

सिंके हुए दाने

और तितलियों को

फूल खोल के !!!!

दे दिया आगाज़ मुझे

और भर दिया मुझमे दम-ख़म;

रख कर सर पर

स्नेह की गर्माहट भरा हाथ !!!

Thursday, August 27, 2009

पाषाण टूटे ,

झरने फूटे

हो गया मन तरल !

सूखी क्यारियाँ ,

भर गयीं फूलों से

खुशबू और रंगों की है चहल-पहल !

पथरीले रास्तों पे ,

उग आई है मुलायम दूब

ज़िन्दगी ने की है पहल !

सवालों को नहीं रही ,

जवाबों की तलब

नए आयाम में आई हूँ मैं टहल !

Monday, August 10, 2009

बह चले पत्ते ,

उड़ चला मन -

कहीं भी, कैसे भी !!

घिरती आ रही बदली

भरती जा रही अन्तर में ,

गीली मिट्टी का सोंधा एहसास -

जैसे प्यार की छुअन पोर-पोर में !!

मदमस्त झोंकों से लहराते पेड़ ,

कोयल की कूक से गूंजता आसमान !!

चित्त हो गया पंख सा हल्का ,

जो भर ली अपने अन्दर

ऐसी सुखद शाम !!!!

Sunday, August 9, 2009

कल रात -

शायद झगडा हो गया था

चाँद और उसके करीबी तारे के बीच

परे - परे थे दोनों एक दूसरे से !

और तो और ,

मुंह फेरा हुआ था चाँद ने अपना

कुछ कुम्हलाया सा !!!

तारा अपनी न जाने किस ऐंठ में

ऊंचा चढ़ा कुछ ज़्यादा ही चमक रहा था

मैं दोनों को अकेला छोड़ आई -

मनमुटाव बड़े पर्सनल होते हैं !!