पुरवाई
पगडंडियों के किनारे चलती हुई
सँभल -सँभल कर !
अभी - अभी ही तो
चमकती नदी पर
बहती आई है !
मंदिर की घंटियों के बाद
बगिया के फूलों को जगाती
फिर तितलियों के साथ
पकड़म - पकड़ाई खेलती !!
दोपहर की धूप में
ज़रा ठहर लेगी किसी पेड़ तले,
साँझ की ठंडक सबको पहुँचा कर,
फिर रात काटेगी -
चाँद को ताकते
किसी टीले पर से !!
Saturday, March 11, 2017
Friday, November 11, 2016
शब्दों को बीनने-पिरोने में लगी हूँ मैं
समय फिसलता जा रहा है
और शब्द -
जैसे सतह की काई !
समेटने के चक्कर में
ख़ुद फिसल जाती हूँ
एक पल को
ख़ुद पर हँसी छूट जाती है
पर दूसरे ही पल
मन अफ़सोस से भर जाता है !
कितने क़िस्से फिसल गये
हाथों से !
पर अनगिनत गले हुये चिपक जाते हैं
मेरी उँगलियों से
सिहरन सी दौड़ जाती है
उफ़ ! कितनी सड़ांध है !!!
समय फिसलता जा रहा है
और शब्द -
जैसे सतह की काई !
समेटने के चक्कर में
ख़ुद फिसल जाती हूँ
एक पल को
ख़ुद पर हँसी छूट जाती है
पर दूसरे ही पल
मन अफ़सोस से भर जाता है !
कितने क़िस्से फिसल गये
हाथों से !
पर अनगिनत गले हुये चिपक जाते हैं
मेरी उँगलियों से
सिहरन सी दौड़ जाती है
उफ़ ! कितनी सड़ांध है !!!
Friday, March 11, 2016
Thursday, December 10, 2015
Thursday, November 5, 2015
आसमान देश
आसमान देश में
बसते हैं बादल बाशिंदे
पल भर को भी एक जगह टिकते नहीं !!
लगते हैं जैसे हो बंजारों की टोली
कुछ अपनी धुन में मदमस्त
तो कुछ को है मेले में पहुँचने की जल्दी !!
उकेरते हैं सुबह से शाम
एक जादू - नगरी,
देखते ही देखते आँखों के सामने
बनते जाते हैं -
घोड़े - हाथी, गुच्छेदार पौधे, झबरीले कुत्ते
और कुछ ही पलों में घुल जाते हैं आसमान में !!
तैरते दिखते हैं जब नीले आसमान में
ये रुई से नरम मुलायम गद्दे,
तो सोचती हूँ
इन पर लेट कर
आसमान देश घूम आऊँ !!
बसते हैं बादल बाशिंदे
पल भर को भी एक जगह टिकते नहीं !!
लगते हैं जैसे हो बंजारों की टोली
कुछ अपनी धुन में मदमस्त
तो कुछ को है मेले में पहुँचने की जल्दी !!
उकेरते हैं सुबह से शाम
एक जादू - नगरी,
देखते ही देखते आँखों के सामने
बनते जाते हैं -
घोड़े - हाथी, गुच्छेदार पौधे, झबरीले कुत्ते
और कुछ ही पलों में घुल जाते हैं आसमान में !!
तैरते दिखते हैं जब नीले आसमान में
ये रुई से नरम मुलायम गद्दे,
तो सोचती हूँ
इन पर लेट कर
आसमान देश घूम आऊँ !!
Friday, September 18, 2015
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