Sunday, December 5, 2021

 दिन की सुनहरी आभा

लोप होती हुई 

श्यामल विस्तार में,

फिर तारों भरी रात का

सूर्योदय के साथ विदा ले लेना -

अनगिनत आयामों में से 

ये एक  आयाम 

दिखाता है मुझे 

प्रकृति के विभिन्न आयामों के 

सहज जुड़ाव का सुंदर स्वरूप,

और सिखाता है मुझे 

कि बहाव ही ज़िंदगी है, जड़ता नहीं ।



Monday, November 22, 2021

 साफ़ हो गया रास्ता यों

धुल गया ज्यों 

बेबाक़ बरसात में 

और 

मौन कमरे में 

धमाचौकड़ी करते शब्द 

निकल आए हैं 

पन्नों के दालान में खेलने !!

Wednesday, February 20, 2019

सुबह सवेरे दिखा चाँद
उड़ा - उड़ा रंग ,
बहुत थका .....

रात कल उसकी थी -
पूर्ण कलाओं वाली 👌
लेकिन सुबह तक चली मस्तियों ने
कर दिया उसे निढाल !
क्या भूल गया वो अपनी समय रेखा ?

या शायद .....
वो चाय की टपरी ढूँढ रहा था
घर जाते हुये 😊


Thursday, November 16, 2017

      और वो चलती गई....

     रस्साकशी समाजों की
      कश्मकश ख़यालों की
     और वो चलती गई.......

      बेढब समय
       बदतर हालात
      और वो चलती गई.......

      हँसने रोने का कार्यक्रम
       गिरने उठने की प्रक्रिया
       और वो चलती गई.......

       ढकेलते ठेलते नुकीले मोड़
       लेकिन पुकारते परवाज़
       और वो चलती गई........


     

Saturday, March 11, 2017

पुरवाई
पगडंडियों के किनारे चलती हुई
सँभल -सँभल कर !

अभी - अभी ही तो
चमकती नदी पर
बहती आई है !

मंदिर की घंटियों के बाद
बगिया के फूलों को जगाती
फिर तितलियों के साथ
पकड़म - पकड़ाई खेलती !!

दोपहर की धूप में
ज़रा ठहर लेगी किसी पेड़ तले,
साँझ की ठंडक सबको पहुँचा कर,
फिर रात काटेगी -
चाँद को ताकते
किसी टीले पर से !!

Friday, November 11, 2016

शब्दों को बीनने-पिरोने में लगी हूँ मैं
समय फिसलता जा रहा है
और शब्द -
जैसे सतह की काई !

समेटने के चक्कर में
ख़ुद फिसल जाती हूँ
एक पल को
ख़ुद पर हँसी छूट जाती है
पर दूसरे ही पल
मन अफ़सोस से भर जाता है !

कितने क़िस्से फिसल गये
हाथों से !
पर अनगिनत गले हुये चिपक जाते हैं
मेरी उँगलियों से

सिहरन सी दौड़ जाती है
उफ़ ! कितनी सड़ांध है !!!




Friday, March 11, 2016

देखा आज आसमान में
चमकती रेत का मैदान,
साँझ की पिघलती धूप में
बिखरे , फैले बादल -
रेतीले टीलों के जैसे !

विस्तार उस व्योम का.....
अपने लघुतम का
एहसास करा गया !!!