ढाँप लेते हैं बादल मुझे
हिफ़ाज़त से -
एक संरक्षक की तरह,
उनमें बहती जा रही हूँ मैं
क्षितिज के उस ओर,
धुलते जा रहे हैं सब ओर-छोर
देते हैं तपते मन को ठंडक -
उन्हीं से बाँट लेती हूँ
आँखों से बरसते मन के उदगार ।
साफ़ नीला आसमान,
सफ़ेद बादलों के चाँदी वर्क में लिपटा
धूप छन के आती जिनसे,
गर्माहट देती गीली मिट्टी को
और मुलायम छुवन से
उठा देती है हर गीले पौधे का सिर -
जो पूरे दिन और रात की पुरज़ोर बारिश से
सहम कर सिमट गया था अपने में !
यूँ लगा मुझे
ज्यों हर पौधा धुल कर चमका
फिर ख़ुशी में लहका !!!