पाषाण टूटे ,
झरने फूटे
हो गया मन तरल !
सूखी क्यारियाँ ,
भर गयीं फूलों से
खुशबू और रंगों की है चहल-पहल !
पथरीले रास्तों पे ,
उग आई है मुलायम दूब
ज़िन्दगी ने की है पहल !
सवालों को नहीं रही ,
जवाबों की तलब
नए आयाम में आई हूँ मैं टहल !
बचपन का भोलापन भी बेहद प्यारा है -
लगा था चलना सीख लिया ,
पर वो तो गिर कर खड़े होने का अभ्यास भर था !!!
तो लो,
फिर से उठी और चल पड़ी मैं :)
थपेड़े तो लगेंगे ही और गिरना भी तय है -
रास्ते हैं ही इतने उबड़ - खाबड़ और घुमावदार !!
पर उस मालिक की महर से
हरे - भरे पेड़ फैला देते मुझ पर ठंडी छाँव ,
अपनी आवाज़ से ज़िन्दगी में मिठास घोलते पंछी
और रंग बिखेरते फूल !!
रोज़ सुबह एक नए दिन की शुरुआत
और सामने वो अभी ख़त्म न हुआ रास्ता ,
फिर से उठ कर चलने की हिम्मत देता है !!!
उस प्यारे शरारती बचपन की यादें -
तैरते हुए बुलबुलों को पकड़ना ,
उँगली लगते ही फूट जाते थे जो !
फूँक से उड़ाना,
वो बुढ़िया के बाल !
बहुत सारे दोस्तों के साथ ,
बहुत सारा खेलना !
फ़िर रात क्यों हो गई ?
बहुत गुस्सा आना !!
कितना आसान था
कट्टी और मिट्ठी कर लेना
नाराज़गी अरसे तक बोझ बनकर नहीं रहती थी ,
भूल जाने में न कोई तकलीफ
ना ही सच बोलने में कोई प्रयास !