Monday, July 4, 2022

 बादलों की छत तले

बूँदों की ओढ़नी 

और फुहारों का बिछौना ।

पुरवाईयों के पंखे

सर-सर, फ़र-फ़र .....

तपिश बह चली है 

बहते पानी के साथ,

रग-रग में भरती जा रही है 

ठंडक और सुकून ।

सराबोर हुआ जा रहा है मन

प्रकृति की इस प्यार भरी छुवन से ।

 ढाँप लेते हैं बादल मुझे 

हिफ़ाज़त से -

एक संरक्षक की तरह,

उनमें बहती जा रही हूँ मैं 

क्षितिज के उस ओर,

धुलते जा रहे हैं सब ओर-छोर

देते हैं तपते मन को ठंडक - 

उन्हीं से बाँट लेती हूँ 

आँखों से बरसते मन के उदगार ।


Saturday, May 28, 2022

बारिश के बाद

 साफ़ नीला आसमान,

सफ़ेद बादलों के चाँदी वर्क में लिपटा 

धूप छन के आती जिनसे, 

गर्माहट देती गीली मिट्टी को

और मुलायम छुवन से 

उठा देती है हर गीले पौधे का सिर -

जो पूरे दिन और रात की पुरज़ोर बारिश से 

सहम कर सिमट गया था अपने में !

यूँ लगा मुझे 

ज्यों हर पौधा  धुल कर चमका 

फिर ख़ुशी में लहका !!!


Thursday, December 9, 2021

 झांकते हुए चाँद ने 

छेड़ी कुछ ऐसी बातें कि

ठंडी हवा से तरंगित

शाख़ों की पत्तियाँ 

हंसते-हंसते हो गयीं

धानी से सुर्ख़ ....

और चाँदनी ने छिटककर 

कर दिया पूरा माहौल 

चमकीला.....ख़ुशनुमा !!!



Sunday, December 5, 2021

 दिन की सुनहरी आभा

लोप होती हुई 

श्यामल विस्तार में,

फिर तारों भरी रात का

सूर्योदय के साथ विदा ले लेना -

अनगिनत आयामों में से 

ये एक  आयाम 

दिखाता है मुझे 

प्रकृति के विभिन्न आयामों के 

सहज जुड़ाव का सुंदर स्वरूप,

और सिखाता है मुझे 

कि बहाव ही ज़िंदगी है, जड़ता नहीं ।



Monday, November 22, 2021

 साफ़ हो गया रास्ता यों

धुल गया ज्यों 

बेबाक़ बरसात में 

और 

मौन कमरे में 

धमाचौकड़ी करते शब्द 

निकल आए हैं 

पन्नों के दालान में खेलने !!

Wednesday, February 20, 2019

सुबह सवेरे दिखा चाँद
उड़ा - उड़ा रंग ,
बहुत थका .....

रात कल उसकी थी -
पूर्ण कलाओं वाली 👌
लेकिन सुबह तक चली मस्तियों ने
कर दिया उसे निढाल !
क्या भूल गया वो अपनी समय रेखा ?

या शायद .....
वो चाय की टपरी ढूँढ रहा था
घर जाते हुये 😊