Tuesday, January 12, 2010

मन है ज्यों

लबालब नदी ,

जीवन की ऊष्मा से तरल ,

झिलमिल करती आशा से !!

मन है ज्यों

मेघ आच्छादित आकाश,

उमड़- घुमड़ कर बरसाने को आतुर ,

नेह भरी बूँदें !!

मन है ज्यों

रंग-बिरंगी तितलियाँ ,

सुन्दर हैं क्षणिक ,

पर शाश्वत हैं उल्लासित !!

मन है ज्यों

अनछुए श्वेत बादल ,

अंतहीन व्योम में तैरते,

सब बेड़ियों से पार !!

मन है ज्यों

तारों भरी रात में ,

लुका-छिपी खेलते सपने,

लम्बी छलांगें लगाते ,

एक से दूसरे सितारे पर !!

2 comments:

दिगम्बर नासवा said...

मन का क्या करें ......... मन तो मौजी है ......... बहुत सुंदर लिखा है ..... ख्यालों में उड़ता ........

नवीन शर्मा said...

itni gooodh hindi me kavita.... wah wah wah ... main baar baar padh raha hun ise... yakeen mano :)