Thursday, February 5, 2009

ओस की बूँदें -

ज्यों बेतरतीब बिखरे हों नायाब हीरे !

रत्न-जड़ित पेड़ पौधों से स्वागत करती है

प्रकृति हर नए दिन का -

अपनी पवित्र और स्वच्छ आभा बिखेरते हुए !

सबसे सुंदर फूल से लेकर ,

एक नन्हे त्रण तक

उसका श्रृंगार है पूर्ण !

है तो क्षणिक -

पर इससे बेशकीमती कुछ भी नहीं !!

5 comments:

Kishore Choudhary said...

nice one, vimmi

Krishna Patel said...

bahut achchhi kavita.

MUFLIS said...

"है तो क्षणिक, पर इस से बेशकीमती
कुछ भी नही .........."
सच कहा आपने , प्रकृति हर पल, हर जगह , अपने आप में
कुछ न कुछ अनुपम लिए हुए है .....
आपकी कविता पढने वाले को प्राकृतिक सौंदर्य के समीप ले जाने में सक्षम है ; बधाई !
आपकी आमद का शुक्रिया . . . . .
---मुफलिस---

saloni said...

waah!kya baat hai.bahut sundar rachna.

ARVI'nd said...

aapki is kavita ko padhkar mai apne aapko prakriti aur koobsurti ke bahut kareeb paaya....achha likha hai aapne