Wednesday, February 25, 2009

चल रही थी मैं

मसूरी की घुमावदार सड़क पर ,

नीचे उतर आए

हल्के-फुल्के बादल मेरा साथ देने ,

हल्की सी ठंड ने लपेट लिया मुझे

और फिर जब तैर गए ऊपर वो सब

तो प्यार भरी फुहार

से भिगो गए तन-मन को ,

रोमांचित और पुलकित कर गया मुझे

इतना बेझिझक प्यार और अपनेपन का इज़हार !

5 comments:

विनय said...

फ़िज़ा को बहुत सुन्दर कविता बना दिया आपने!

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चाँद, बादल और शाम

MUFLIS said...

"पुलकित कर गया मुझे इतना बे-जिझाक प्यार ..."

मन की सुकोमल भावनाओं
और प्राकृतिक सौंदर्य का अनूठा और अनुपम संगम आप की कविता में ब- khoobi
jhalak रहा है .............
एक बहुत achhi rachna के लिye badhaaee svikaarein .
---MUFLIS---

नारदमुनि said...

mousam ka varnan shandar tarike se kiya . narayan narayan

राजीव करूणानिधि said...
This comment has been removed by the author.
राजीव करूणानिधि said...

बेहतरीन रचना lagi आपकी. बस ज़ज्बा बरकरार रखें. बधाई.