Monday, August 10, 2009

बह चले पत्ते ,

उड़ चला मन -

कहीं भी, कैसे भी !!

घिरती आ रही बदली

भरती जा रही अन्तर में ,

गीली मिट्टी का सोंधा एहसास -

जैसे प्यार की छुअन पोर-पोर में !!

मदमस्त झोंकों से लहराते पेड़ ,

कोयल की कूक से गूंजता आसमान !!

चित्त हो गया पंख सा हल्का ,

जो भर ली अपने अन्दर

ऐसी सुखद शाम !!!!

2 comments:

विनय ‘नज़र’ said...

विमी जी बहुत ही अच्छी कविता लिखी है आपने!
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राम सेतु – मानव निर्मित या प्राकृतिक?

दिगम्बर नासवा said...

ANJAANE SE PREM KI MUKHAR ABHIVYAKTI.... PAAGAL MAN KI UJWAL ABHIVYAKTI HAI AAPKI RACHNA.... SUNDAR