Sunday, August 9, 2009

कल रात -

शायद झगडा हो गया था

चाँद और उसके करीबी तारे के बीच

परे - परे थे दोनों एक दूसरे से !

और तो और ,

मुंह फेरा हुआ था चाँद ने अपना

कुछ कुम्हलाया सा !!!

तारा अपनी न जाने किस ऐंठ में

ऊंचा चढ़ा कुछ ज़्यादा ही चमक रहा था

मैं दोनों को अकेला छोड़ आई -

मनमुटाव बड़े पर्सनल होते हैं !!

2 comments:

विनय ‘नज़र’ said...

very beautiful poem

दिगम्बर नासवा said...

वाह क्या बात कही ...... मनमुटाव पर्सनल होते हैं.......... खूबसूरत, प्यारी सी रचना है आपकी........ मन में उतर गयी सीधे