Thursday, April 23, 2009

दिन उठा और निकल पड़ा अपने रास्ते

हमराही कोई हो या नहीं !

कलियाँ खिल गयीं और झूम गई डाली

जलतरंग बजी हो या नहीं !

सांझ उतरती आ गई आँगन में

दीये जलाये हों या नहीं !

रात ने फैलाई अपनी तारों भरी लोई

सुकून भरी नींद हम ओढ़ पाए हों या नहीं !

हर पल है आस और हर साँस है सुकून

हम महसूस कर पाए हों या नहीं !

4 comments:

अमिताभ श्रीवास्तव said...

prakarti apna kaam nit karti he..hame usase jivan lenaa he to le yaa naa le..use kya??? par ham to usi par aashrit he..sochna hoga..

sundar rachnaa ..
saadhuvaad

MUMBAI TIGER मुम्बई टाईगर said...

रात ने फैलाई अपनी तारों भरी लोई सुकून भरी नींद हम ओढ़ पाए हों या नहीं !
bhaut Sundar * * * * *

नवीन शर्मा said...

simple is beautiful :)...
is baat ka pratyaksh parmaan aapki poems hoti hain :)..

regards
N

"लोकेन्द्र" said...

'हर पल है आस और हर साँस है सुकून'

अच्छी रचना लिखी है आपने.....