Thursday, May 14, 2009

उस प्यारे शरारती बचपन की यादें -

तैरते हुए बुलबुलों को पकड़ना ,

उँगली लगते ही फूट जाते थे जो !

फूँक से उड़ाना,

वो बुढ़िया के बाल !

बहुत सारे दोस्तों के साथ ,

बहुत सारा खेलना !

फ़िर रात क्यों हो गई ?

बहुत गुस्सा आना !!

कितना आसान था

कट्टी और मिट्ठी कर लेना

नाराज़गी अरसे तक बोझ बनकर नहीं रहती थी ,

भूल जाने में न कोई तकलीफ

ना ही सच बोलने में कोई प्रयास !

5 comments:

अमिताभ श्रीवास्तव said...

bahut khoob vimiji,
bachpan ki nazakat, bilkul apni komalta ke jariye abhivyakt hoti he/
aapne to mujhe mere bachpan ki yaad dila di, shararti to tha hi, shayad ab bhi hoo..bulbulo ko fodta tha,, doosro ke jyada/ budhiya ke baal khoob khaye..ab nahi milte ab yaad aati he/
raat meri dushman rahi he, hamesha se hi/// aour ye sab aapki kavita me pana, aapki kavita ki sarthakta he//har kisi ka bachpan jo usme jhalkta he// katti-miththi..pal-pal ki baat rahi..sachmuch maza aa gaya aapki rachna padhhkar/ dhnyavaad

विनय said...

बहुत ख़ूबसूरत कविता है, मन के भावों को उकेर देती है

MUFLIS said...

बचपन की साफ़-सुथरी नादानियों और
बिलकुल नेक शरारतों पर बहुत ही
पाकीज़ा अल्फाज़ पिरोये हैं आपने
बधाई

---मुफलिस---

नवीन शर्मा said...

bhut khoooob :)
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कोई तो यूं भी दिलाये यादें बचपन की,
हल्की सी शरारत या मामूली अनबन की..

ग़ुस्से से मुँह फुला लेना वो मेरा
उसपे जीभ चिढ़ा देना वो तेरा
टाफी भरी जेब और गुल्लक की खनखन की
कोई तो यूं भी दिलाये यादें बचपन की

दोपहरी में पीपल पे कंचे चटकाना
गुलमोहर की डाली से पतंगें छुटाना
दीपू के मामा की नई टमटम की
कोई तो यूं भी दिलाये यादें बचपन की

बबीता का रहना पढाई में आगे
हमारे बाबूजी पिटाई में आगे
साबू, मोटु-पतलू और नंदन की
कोई तो यूं भी दिलाये यादें बचपन की

बहुत खूब बीता यूं बचपन हमारा
दस्तक दे रहा था लड़कपन बेचारा
पोलिश जूते,शहरी बनठन की
कोई तो यूं भी दिलाये यादें बचपन की

कोई तो यूं भी दिलाये यादें बचपन की,
हल्की सी शरारत या मामूली अनबन की

''ANYONAASTI '' {अन्योनास्ति} said...

क्या भूलूं क्या याद करूँ ,लौटेगा न वो बचपन ,
वक्त से चाहे जितनी विनती-फरियाद करूँ ||
माँ का गुस्सा , दीदी की मनुहार ,
दद्दा का इकरार , बाबूजी का प्यार,
भूले-भटके मिलते थे कभी-कभी ,
माँ नरम ,बाबूजी गरम ,दीदी चि़ड़चिड़,दद्दा के तेवर ,
यही बचपन की जमा-पूंजी ब्याज में भौजाई का दुलार ||
आप की कविता पढ़ जो प्रशंसा शब्द उभरे मन में अर्पित हैं