Saturday, January 17, 2009

बालकनी से दिखता


वो सामने वाला पेड़


हर पल है उस पर आवा-जाही !


सूरज की पहली किरण के साथ ही


अलग-अलग सुरों की सरगम -


कभी कूके कोयल


तो कभी कौवे की कांव-कांव


गिलहरियाँ धमा-चौकड़ी मचाती हैं


एक डाल से दूसरी पर !!


मुसाफिर पंछी


करते हैं कुछ पल विश्राम


और जिनका है बसेरा यहाँ


वो देखा करते हैं ये तमाशा बेपरवाह -


रोज़ की ही तो बात है !!!!

3 comments:

नवीन शर्मा said...

विमी जी,
अच्छा लेख था.. हम सब भी तो ऎसे ही हैं दुनिया में.. थोडे समय के लिये शरीर मिलता है। किसी को 40 साल किसी को थोडा और .. पर सबकी मियाद नियुक्त है.. जैसे हम किसी शहर में घूमने जायें और होटेल को अपना समझ के उसके रंग रोगन और दूसरी चीज़ों के बारे में चिंता करने लगें तो होटेल वाले हमको बेवकूफ ही कहेंगे..वैसे ही हमको इस ज़िन्दगी से सबक लेना चाहिये जो हर लन्हा हमारे सामने एक सवाल छोडती है कि क्या हमने अपने असली शहर की पहचान की है ... हमें जहां जाना है ये थोडी सी मियाद गुजार कर.. परिंदों ने बहुत कुछ सिखाया कि :
रहना नहीं यहां, देस बिराना है ... [ कबीर जी ]

आदर सहित

Jimmy said...

vimi ji aapne bouth he aacha post hai yar dear keep it up


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रौशन said...

रोज की बात है !
और रोज की ये छोटी बातें कितनी खूबसूरत हो सकती हैं ये इस कविता में झलक रहा है