Friday, January 9, 2009

भोर का ठंडा शांत प्रहर -

समय का स्पंदन रुक गया हो जैसे

पर आकाश देता है पल-पल रंग बदल कर गवाही

कि समय है गतिमान हमेशा !

जाती हुई रात और आता हुआ सवेरा -

है कुदरत का सबसे सुंदर कैनवास !

कुहासे की उस हलकी सी पर्त को

अपने में समा लेता है प्रभात

और ओस जड़े फूलों को जगाता है

अपने गर्माहट भरे स्पर्श से सूरज

यह अनूठा बदलाव चित्त को कर देता है शांत

और मन को भर देता है एक सुखद अनुभूति से !!!

2 comments:

श्यामल सुमन said...

यह अनूठा बदलाव चित्त को कर देता है शांत

और मन को भर देता है एक सुखद अनुभूति से !!!

बहुत सुंदर रचना .....
बधाई ....

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

जाड़े की नरम ठण्ड में गुनगुनी सी रचना बधाई.